रविवार, अगस्त 24, 2014

देखते देखते

दबे पाँव आई जो मेहफिल में वो,
थम गयी धड़कने देखते देखते !!

छुपते छुपाते जो नज़रें मिली,
बढ़ गयी उलझनें देखते देखते!!

देखने देखने से हुआ वो असर,
बातें बढ़ने लगीं देखते देखते!!

बातों बातों में वो करिश्मा हुआ,
हो गयी दोस्ती देखते देखते !!

मेहफिल की जवानी जो ढलने लगी,
जवान होने लगीं चाहतें देखते देखते !!

वक़्त

वक़्त भला क्या, वक़्त बुरा क्या ?
काले काले मेघों जैसा
आते जाते ही रहते हैं
पर भला पथिक रुक जाता है क्या ?

इंतेज़ार की घड़ियाँ लम्बी हो सकती हैं !
रात का अंधेरा भी आ सकता है
सगे साथी भी मुंह मोड ले सकते हैं !
होने को तो कुछ भी हो सकता है
पर भला पथिक रुक जाता है क्या ?

ये बदल हैं आते जाते रहते हैं
एक तेज़ हवा का झोंका तितर बितर कर देगा!
तब तक संभल के चलना होगा, मज़िल तक चलना होगा !