बुधवार, जुलाई 14, 2010

तुम हो जहाँ, मैं हूँ वहाँ

तुम हो जहाँ, मैं हूँ वहाँ
हर सांस में, विश्वास में|
महसूस करके देख तो,
जज़्बात में, अहसास में||
                 
तुम्हें दूर रह कर क्या मिला?
वो भी खो दिया जो था पास में!
मसरूफ़ इतनी खुद में थी,
की खबर ना थी, में हूँ पास में|
आजमा के मुझको देख तो,
देके हाथ मेरे हाथ में || (१)

तुम चाहती हो की मैं बोल दूं,
सारे राज़ दिल के खोल दूं
मैं कह भी दूं पर सोचता
आ जाउँ पहले होश में
बढ़ जायें न बेताबियाँ,
मदहोंशियाँ, आगोश में || (२)

शनिवार, मई 22, 2010

मन की व्यथा



मन मे व्यथा, तन में व्यथा!
दिल में व्यथा, ज़ीवन में व्यथा!

यह व्यथा तो आँसू बन कर गिरना चाहे हैं,
कोई कब से नीचे दामन फैलाए है!

गिरतें हैं अश्क ज़रूर, सिमट जातें हैं दामन में
बन जाता है कोई मोती सुनहरा!

भेंट देते हैं जब वो मुस्कुरा कर,
लगता है दुनिया का रंग हरा भरा!

फिर अचानक जुब वो जाने की बात करतें हैं,
पथरा जाती हैं आँखें होंठ सूख जातें हैं,
देखना है फिर वो कब आते हैं!